पिट्युटरी या पीयूष ग्रंथि: संरचना एवं हॉर्मोन

 पिट्युटरी या पीयूष ग्रंथि को शरीर के ग्रंथि तंत्र का हैड मास्टर कहा जाता है, पर ऐसा क्यों है? चलिए जानते हैं कि पिट्युटरी के विषय में सब कुछ: 



पिट्युटरी ग्रंथि क्या होती है? 

हमारे दिमाग़ के नीचे एक मटर के आकार की ग्रंथि होती है जिसका वजन ०.५ ग्राम होता है इसको ही पीयूष ग्रंथि कहते हैं। 

ये माना जाता है कि इसका निर्माण हाइपोथैलेमस से ही होता है। 

इसके दो भाग होते हैं: 

  1. अग्र भाग
  2. पश्च भाग ( ये भाग हाइपोथैलेमस से जुड़ा होता है)

ग्रंथि की शरीर में स्थिति: 

पीयूष ग्रंथि हमारी खोपड़ी में दिमाग़ के सबसे निचले हिस्से में पाई जाती है। 

खोपड़ी की हड्डी में इसके लिए एक गड्ढे नुमा स्थान होता है जिसको “पिट्युटरी फोसा (pituitary fossa)”कहते हैं। 

चारों तरफ़ से जिस हड्डी से घिरी रहती है उसको “सेला टर्सिका(cella turcica)” कहते हैं। 

ग्रंथि एक झिल्ली से ढकी हुई रहती है जिसको “डायफ्रामा सेल्ली (diaphragma cellae)” कहते हैं। 

पिट्युटरी ग्रंथि के कार्य: 

यह शरीर में होने वाली लगभग सभी गतिविधियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करता है जिनमें प्रमुख हैं: 

  1. शरीर की वृद्धि एवं विकास
  2. ब्लड प्रेशर
  3. गर्भावस्था 
  4. माता के शरीर में दूध बनना एवं उसका स्राव
  5. शरीर में पानी की मात्रा को नियंत्रित करना 
  6. किडनी व थायरॉइड के कार्यों को नियमित रखना

पिट्युटरी ग्रंथि के अग्र भाग से निकलने वाले हॉर्मोन व उनके कार्य: 


ग्रोथ हॉर्मोन(Growth hormone): 

ये शरीर की वृद्धि एवं विकास होने के लिये आवश्यक है एवं शरीर में वसा व कार्बोहाइड्रेट के पाचन को प्रभावित करता है। 

यदि बच्चे में इसकी कमी हो जाती है तो बौनापन हो सकता है या लम्बाई सामान्य से कम हो सकती है। 

यदि अधिकता हो जाती है तो शरीर का विकास सामान्य से बहुत अधिक हो जाता है इसको महाकायता (Gigantism) कहते हैं। 

ACTH( Adrenocorticotropic Hormone): 

ये शरीर की एडरीनल ( Adrenal) ग्रंथि को निम्नलिखित हॉर्मोन्स को बनाने व इनका स्राव करने के लिए आदेशित करता है: 

  1. ग्लूकोकॉर्टिकॉइड्स (glucocorticoids)
  2. मिनरलोकॉर्टिकॉइड्स (mineralocorticoids) 

ये दोनों  हॉर्मोन शरीर में खनिज पदार्थों को नियमित करने का काम करते हैं। 

थायरॉइड स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन ( Thyroid stimulating Hormones Or TSH): 

ये थायरॉइड में T3, T4 हॉर्मोन का बनना एवं उनका रक्त में स्राव नियमित करता है। 

फॉलिकल स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (FOLLICLE STIMULATING HORMONE): 

प्रजनन अंगों के विकास एवं वृद्धि में सहायक होता है। 

ल्युटिनाइजिंग हॉर्मोन (Luteinizing hormone): 

शरीर में सेक्स हॉर्मोन जैसे कि टेस्टोस्टीरोन ( पुरुषों में) और एस्ट्रोजन ( महिलाओं में)  का बनना व रक्त में स्राव होना ये सब इसी हॉर्मोन से नियंत्रित होता है। 

सैक्स हॉर्मोन का कार्य होता है गर्भ में बच्चे का लिंग निर्धारण करना, मतलब कि बच्चा लड़का होगा या लड़की इसके लिए क्रोमोसोम के अलावा इन हॉर्मोन का होना भी आवश्यक है। 

बच्चा जब बड़ा हो रहा होता है तो किशोरावस्था में आकर उसके अंदर अपने लिंग के अनुसार कुछ बदलाव आते हैं जिन्हें अनुपूरक अंग कहते हैं, ये सारे बदलाव भी इन सैक्स हॉर्मोन के कारण ही आते हैं। 

प्रोलैक्टिन (Prolactin): 

इसका मुख्य कार्य माँ के शरीर में बच्चे के लिए दूध का सृजन करवाना है। 

पिट्युटरी पश्च भाग से निकलने वाले हॉर्मोन व उनके कार्य: 

Antidiurectic Hormone: 

इस हॉर्मोन का मुख्य कार्य शरीर से पानी के निकलने को रोकना और शरीर के रक्त चाप तो बढ़ाना है।

ऑक्सीटोसिन ( Oxytocin): 

इस हॉर्मोन का नाम बहुत सारे लोगों  ने सुन रखा होगा, इसका इस्तेमाल मवेशियों से दूध निकालने के लिए किया जाता है। 

इंसान में इस हॉर्मोन के दो प्रमुख कार्य होते हैं: 

  1. बच्चे को जन्म देते समय गर्भ का संकुचन करवाना
  2. बच्चे को दूध पिलाते समय माता के शरीर से दूध बाहर निकालना।

तो अब तक हम पिट्युटरी ग्रंथि से निकलने वाले हॉर्मोनों के नाम व उनके कार्य जान चुके हैं अब जानते हैं इनकी कमी से होने वाली बीमारियों के विषय में, आप कैसे पहचानेंगे कि आपकी पीयूष ग्रंथि की कार्यप्रणाली में कुछ कमी है: 

पिट्युटरी या पीयूष ग्रंथि की बीमारियों के दो प्रकार होते हैं: 

हाइपोपिट्युटरिज्म (Hypopituitarism): 

जब एक या उससे ज़्यादा हॉर्मोन सामान्य से कम स्रावित होते हैं जैसे ग्रोथ हॉर्मोन की कमी या ADH की कमी।  

हाइपरपिट्युटरिज्म (Hyperpituitarism): 

जब एक या उससे अधिक हॉर्मोन का स्राव सामान्य से अधिक होने लगता है। 

अब बात आती है कि हम पहचानें कैसे कि हमारी पीयूष ग्रंथि में कोई समस्या है?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें देखना होगा कि पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले ज़्यादातर हॉर्मोन अन्य ग्रंथियों पर कार्य करते हैं उनको अन्य हॉर्मोन बनाने व उनका स्राव करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो पिट्युटरी ग्रंथि की कार्यप्रणाली में समस्या आने पर हमें अन्य ग्रंथियों के हॉर्मोन के कारण होने वाले लक्षण दिखेंगे। 

इसको एक उदाहरण से समझते हैं जैसे यदि थायरॉइड स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन या TSH की कमी हो जाए तो थायरॉइड ग्रंथि से निकलने वाला हॉर्मोन कम निकलेगा, जिसके कारण जो लक्षण आएँगे वो थायरॉइड की कमी वाले आएँगे। 





 




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